क्या जर्मनी में भी रहा है जाट समुदाय का वर्चस्व ? जानिए पूरी कहानी

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NEWSAGENDA24, NEWS DESK

मध्य एशिया की बड़ी जेटी/जट्टा जाति में अश्वमेध का रिवाज था और संक्रांति के शुभ अवसर पर यह महोत्सव उनके यहां होता था। पिंकर्टन ने यूरोप में जाटों के साथ सुएवी, कट्टी, केम्ब्री और हेमेन्द्री आदि 6 जातियां रहती थीं। ये सब एल्प और वेजर नदी के किनारे तक फैल गई थीं। वहां उन्होंने युद्ध के देवता महादेव के नाम पर एक विशाल स्तंभ खड़ा किया था।


जाटों ने यूनान में कर्जसीज को और अर्बेला में दारा को रथों की सेना की सहायता दी थी। इस सेना में 150 हाथी और 200 रथ थे। कर्नल टाड ने हेरोडोटस के आधार पर लिखा है कि इन लोगों से युद्ध करने के लिए सिकन्दर को स्वयं कमान संभालनी पड़ी थी। वे अपनी भुजाओं के बल से यूनानियों को प्रत्येक आचरण में विफल कर देते थे। उन्होंने सिकन्दर की पर्शिनियो की कमान वाली सेना को अस्त-व्यस्त कर दिया था, जिससे उसे दूसरी सेना उनसे भिड़ने के लिए भेजनी पड़ी थी। प्रत्येक जाट ने वह पराक्रम दिखाया था, किन्तु अर्बोला के युद्ध में दारा की पराजय हुई थी। काछी लोग भी इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़े थे।

दलीप सिंह अहलावत ने अपनी किताब में लिखा है कि विजेता जाट अत्तीला का साम्राज्य कैस्पियन सागर से लेकर राइन नदी (पश्चिमी जर्मनी में) तक फैला हुआ था। तात्पर्य है कि जाटों का निवास व शासन जर्मनी में भी रहा है। ये लोग ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व जर्मनी में पहुंचे। यूरोप के अन्य देशों इटली, गॉल, स्पेन, पुर्तगाल, इंगलैण्ड और यूनान आदि पर जो जाटों ने आक्रमण किये उनका वर्णन यूरोपीय इतिहास में यही मिलता है कि उसमें अधिकांश जाट लोग जर्मनी और स्कन्धनाभ (स्केण्डेनेविया) के निवासी थे।

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मैक्समूलर ने भी जर्मनी में जाट रक्त स्वीकार किया है। उन्होंने लिखा है कि “जर्मन लोगों के रहन-सहन, आकृति, रस्म व रिवाज तथा नित्य कार्यों का जो वृत्तान्त पाया जाता है उससे विदित होता है कि कदाचित् ये लोग और शाक द्वीप (ईरान) के जिट, कठी, किम्बरी (कृमि) और शिवि (चारों जाट) एक ही वंश के हैं।”
आगे यही लिखते हैं कि “जर्मन लोग घोड़े की आकृति बनी हुई देखकर ही सिक्के का व्यवहार करते थे, अन्यथा नहीं। यूरोप के असि जेटी लोग और भारत के अट्टी तक्षक जटी, बुध को अपना पूर्वज मानकर पूजते थे। प्रत्येक जर्मन का बिस्तर पर से उठकर स्नान करने का स्वभाव जर्मनी के शीतप्रधान देश का नहीं हो सकता, किन्तु यह पूर्वी देश का है।”

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कर्नल टॉड ने लिखा है कि “घोड़े की पूजा जर्मनी में सू, कट्टी, सुजोम्बी और जेटी (जाट) नाम की जातियों ने फैलाई है, जिस भांति कि स्कन्धनाभ में असि जाटों ने फैलाई।” कर्नल टॉड ने भारत के जाट और राजपूत तथा जर्मन लोगों की समानता के लिए लिखा है कि “चढ़ाई करने वालों और इन सब हिन्दू सैनिकों का धर्म बौद्ध-धर्म था। इसी से स्केण्डेनेविया वालों और जर्मन जातियों के आचार, विचार और देवता सम्बन्धी कथाओं की सदृश्यता और उनके वीररसात्मक काव्यों का मिलान करने से यह बात अधिकतर प्रमाणित हो जाती है।”
प्रसिद्ध इतिहासज्ञ टसीटस ने लिखा है कि “जर्मनी और स्कन्धनाभ के असि लोग जाटवीर थे।

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जाट इतिहास (अंग्रेजी) पृ० 36 पर लेफ्टिनेन्ट रामस्वरूप ने लिखा है कि “प्राचीनकाल में जर्मनी पर शिवि गोत्र के जाटों का राज्य व निवास था।”


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