अटल बिहारी वाजपेयी की चौथी पुण्यतिथि पर पढ़ें उनकी ये शानदार कविताएं

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न्यूजएजेंडा24.कॉम ब्यूरो, नई दिल्ली। एक सुलझे राजनेता, प्रखर वक्ता, बेहतरीन कवि और भारत के दसवें प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आज तीसरी पुण्यतिथि है।आज उनकी पुण्यतिथि पर आइए पढ़ते हैं उनकी ये कविताएं जो जीवन पर हर कदम नई सीख देती हैं

मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना

ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आजकल की नहीं
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?

 

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी
जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे

कौरव कौन
कौन पांडव
टेढ़ा सवाल है

दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है

धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है

बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है 

खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया
बंट गए शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार गड़ गई
दूध में दरार पड़ गई
 खेतों में बारूदी गंध,
टूट गए नानक के छन्द
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी वितस्ता है,
वसंत में बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं गैर,
खुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता
बात बनाएं, बिगड़ गई
दूध में दरार पड़ गई


ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है


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