अभय त्रिपाठी का कॉलम: उर्जा का स्त्रोत गोवंश

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अभय त्रिपाठी

एक अनुमान के अनुसार भारत के देहाती क्षेत्रों में बैलों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही ऊर्जा लगभग 40 हजार मेगावाट के बराबर है। इसके बावजूद पशुओं की नस्ल-सुधार की वर्तमान नीति एवं प्रक्रिया उर्जा- उपलब्धि को बढ़ाने की ना होकर केवल दुग्ध- उत्पादन को बढ़ाने के लिए ही है। इसके परिणामस्वरूप भैंस प्रजाति को प्रोत्साहन मिला है क्योंकि यह दूध अधिक देती है और इनके दूध में घी भी अधिक मात्रा में होता है. गाय का दूध गुणात्मक दृष्टि से अच्छा होने के बावजूद भैस के दूध से कम कीमत में बिकने लगा क्योंकि इसमें घी कम मात्रा में होता है। ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग के कारण तथा नस्ल सुधार नीति द्वारा बैल के उपेक्षा से बचपन से ही नर प्रजाति (गाय और भैस दोनों की ही) उपेक्षा हो रही है तथा उनके मांस के व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसे निर्यात के कारण भी विशेष प्रोत्साहन मिला है इसके कारण दूध देने वाली गाय और भैंस का दूध निकालने वाली प्रक्रिया भी बड़ी क्रूर और अमानवीय हो गई है।

परम्परागत विधि के अनुसार पहले बच्चे को दूध पिलाया जाता था उसके पश्चात गाय अथवा भैंस का दूध दूहा जाता था जिससे ममता प्रेरित प्रकृतिक हार्मोनों के स्त्राव के फलस्वरूप गाय और भैंस दूध दिया करता थी परन्तु अब यान्त्रिक विधि से गाय और भैंस को दूध देने के लिए मजबूर किया जाता है और गम्भीर पीड़ा की परिस्थिति में उनका दूध निकाला जाता है यह अमानवीय कृत्य बाजार संस्कृति के इस देश पर हाबी हो जाने के कारण आज नित्य प्रति हो रहा है और पीड़ा युक्त दूध के हिंसात्मक संस्कार हमारे जनमानस में दिन रात घुल रहे हैं इसलिए यदि आज के जीवन में हर कोई सामन्य स्थिति में तनावग्रस्त है और झल्लाने को उतारू है तो इस पर किसी को आश्चर्य़ नहीं होना चाहिए दूसरी ओर नर प्रजाति के हनन से ग्रामीण उर्जा का सुगम स्त्रोत धीरे-धीरे सूख रही है जबकि आयातित डीलज के दाम दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं और उसकी मांग भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी। सर्वनाश का यह खेल आज हमारी आंखों के सामने बड़े नियोजित ढंग से बहुत बड़े पैमाने पर नई सोच समझ के अनुसार होता हुआ प्रतीत हो रहा है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)


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